बुधवार यानि 31 जूलाई 2019 को बिहार में स्थित कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय में मुंशी प्रेमचंद की 139वीं वर्षगाँठ उत्सुकतापूर्वक मनाई गई. दुनिया भर में अपने कथा और कहानियों के जरिये हिन्दी को एक नए मुकाम तक पहुंचाने वाले महानतम कथाकारों में शुमार मुंशी प्रेमचन्द की लिखी कहानियां आज भी हिन्दी पाठ्यक्रम के हिस्सा हैं.

इस अवसर पर शिक्षा-शास्त्र के निदेशक डॉ. घनश्याम मिश्रा ने उनके हिन्दी साहित्य की दिशा में दिये गए बहुमूल्य और अनोखे योगदान का स्मरण करते हुए कहा कि उनके साहित्य से साहित्य को जीवित रखने की कला सीखी जा सकती है. उन्होंने कहा कि जिस समय मुंशी प्रेमचन्द लिख रहे थे उस समय साहित्य सौन्दर्य का विषय नहीं, समाज को जागृत करने का विषय था और मुंशी प्रेमचन्द ने बखूबी उस समय की जरुरत को साहित्य में ढ़ाला.

वहीं कार्यक्रम की संयोजिका व विश्वविद्यालय की शिक्षिका रीता सिंह ने प्रेमचन्द के साहित्य को भारतीय समाज का दर्पण बताते हुए कहा कि प्रेमचन्द का साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है. उन्होंने कहा कि यह साहित्य नहीं एक आंदोलन है हम इससे मार्गदर्शन लेकर समाज के विसंगतियों को दूर कर सकते हैं.

इस गौरवपूर्ण अवसर पर राजनारायण चौधरी, आकांक्षा राय, कुंदन झा, दयासागर झा, सत्यपाल पाठक, शैलेश झा, राकेश चौधरी, जयशंकर प्रसाद, अंकिता और शिवकुमार राम आदि छात्रों ने भी अपने वक्तव्यों को उत्सुकतापूर्वक रखा. इस मौके पर भवेश झा ने बखूबी मंच का संचालन किया और विभागिय प्राध्यापक डॉ ऋद्धि झा ने कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन किया. इस कार्यक्रम में डॉ रामानंद झा, पवन सहनी, संजीव कुमार आदि शिक्षक गण उपस्थित रहे.

Leave a Reply