July 29, 2021

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हिन्दू धर्म में इन राक्षसों की पूजा होने की असली वजह

Do you know that the real cause of the worship of these demons in Hindu religion

Do you know that the real cause of the worship of these demons in Hindu religion

हिन्दू धर्म में इन राक्षसों की पूजा होने की असली वजह

आज हम आपको अवगत करयेंगे ऐसे दैत्यों से जो अब देव तुल्य पूजे जाने लगे हैं।  

  1. इनमें सबसे पहला नाम आता है राहु केतु का, पूरे पौराणिक काल में देवताओं और राक्षसों ने सिर्फ एक ही काम मिलकर किया था। ‘समुद्र मंथन’ 

विष्णु पुराण के अनुसार समुद्र मंथन में जब अमृत निकला तो राक्षसों और देवताओं के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए। तभी विष्णु भगवान ने मोहिनी रूप धर राक्षसों को सम्मोहित कर अमृत देवताओं को पिला दिया। लेकिन राहुकेतु को पहले ही इस घटना का संदेह हो चुका था, इसलिए उसने देवता का रूप लेकर अमृत पान कर लिया।  बाद में विष्णु भगवान के सुदर्शन चक्र ने राहुकेतु का सर धड़ से अलग कर दिया, अमर होने के कारण राहुकेतु एक से दो राक्षसों में बदल गया, सर राहु और धड़ केतु.राहु-केतु की इस दुर्दशा का कारण चन्द्रमा और सूर्य थे, तभी से सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण के प्रभाव से बचने के लिए राहु और केतु की पूजा होती है।

2. दूसरा नाम तो और चौका देने वाला है ‘रावण’

जी हाँ दुराचारी और क्रूर राक्षस की पहचान पाने वाला रावण, भारत में कई जगह देव तुल्य माना जाता है। लेकिन रावण की पूजा यह उसके कर्मों के आधार पर नहीं बल्कि ज्ञान और सामर्थ की वजह से की जाती है, ये तो सभी जानते है कि रावण के पिता के ब्राह्मण थे इसलिए रावण प्राम्भ से ही कई विद्याएं, वेद, पुराण, नीति, दर्शनशास्त्र का ज्ञाता था। रावण शिव जी का परम भक्त होने साथ साथ शिव जी का पुरोहित था, यहां तक रामायण में रामसेतु निर्माण के लिए भूमि पूजन रावण के द्वारा ही किया गया था। रावण के ज्ञान की प्रसंशा स्वं भगवान राम और शिव जी के दवरा की गई. अब तो आप समझ ही गए होंगे रावण की पूजा होने का कारण क्या था।

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3. इसी कड़ी में 3 नाम अत्यंत रहस्य्मयी है जिसके बारे में अधिकांश लोग नहीं जानते वो है ‘ मूषकराज’

मूषकराज जो गणेश जी के वाहन है वो पहले महापापी दैत्य गजमुखासुर हुआ करते थे, जिसने शिव की घनघोर तपस्या कर सिर्फ अपने जैसे से ही हारने का वरदान माँगा। भगवान् शिव  ने वरदान तो दिया लेकिन इसका उपाय पहले ही सोच लिया। जब गजमुखासुर ने आतंक की सीमाएं लांघी, तो शिव जी के कहने पर गणेश जी ने गजमुखासुर को, भयकर युद्ध में परास्त कर दिया। साथ ही इतना मारा की गजमुखासुर चूहा बनकर भागने लगा तभी गणेश भगवन ने उसको पकड़ लिया। गजमुखसुर की विनती और क्षमा याचना को मानकर, गणेश जी ने गजमुखासुर को अपना वाहन मूषकराज बना लिया। तभी से गणेश जी के साथ मूषकराज की भी पूजा होने लगी।

4. अंत में जो नाम है इसकी पूजा तो आप भी करते है लेकिन ये भी पहले दानव के प्रवृत्ति के हुआ करते थे इनका नाम है ‘बाबा भैरवनाथ’

पौराणिक कथा के अनुसार बाबा भैरवनाथ माँ वैष्णों देवी को बाल्य अवस्था में ही मार देना चाहता था, लेकिन वैष्णों माँ बाबा भैरवनाथ को सही रास्ता दिखाना चाहती थी, लेकिन जब भैरवनाथ माता को मारने के उद्देश्य से उनका पीछा कर रहा था तो देवी एक गुफा में चली गई जहां हनुमान जी पहरा दे रहे थे. पहले तो भैरव बाबा और हनुमान जी का युद्ध हुआ और जैसे ही हनुमान जी भैरवनाथ को मृत्यदंड देने वाले थे माँ वैष्णो देवी ने आकर रोक लिया और भैरवनाथ का सर काट दिया। लेकिन मरते मरते भैरवनाथ के मुँह से जय माता दी निकला। जिसके कारण बाबा भैरवनाथ पाप मुक्त हुए और पूजा भी होने लगी. कहा जाता है कि वैष्णों माता के दर्शन तभी सफल होते है जब आप बाबा भैरवनाथ के दर्शन कर लेते हैं।

हमने तथ्यों को सही रखने की पूरी कोशिश की है लेकिन शत प्रतिशत प्रमाण की पुष्टि करना असंभव है।